रविवार, 6 दिसंबर 2009

सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ साझा अभियान

धार्मिक कट्टरपंथ तथा आतंकवाद एक दूसरे के पूरक हैं। छः दिसंबर भारतीय संविधान तथा साम्प्रदायिक सद्भाव पर आधारित हमारी परम्परा के चेहरे पर बदनुमा दाग़ है। आर एस एस और उसके आनुसांगिक संगठनो ने सत्ता के लोभ में देश के भीतर जो धार्मिक उन्माद पैदा कर लोगों के बीच साम्प्रदायिक विभाजन किया वही आज आतंकवाद के मूल में है। मनमोहन सिंह कहते हैं की माओवाद देश के सम्मुख सबसे बड़ा खतरा है पर वास्तविकता यह है कि हमारे सम्मुख सबसे बड़ा खतरा धार्मिक कट्टरपंथ है। यह बातें आज युवा संवाद की पहलकदमी पर दिसंबर को आयोजित साम्प्रदायिकता और आतंकवाद विरोधी दिवस पर अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए डा मधुमास खरे ने कही।


उल्लेखनीय है कि युवा संवाद, संवाद, स्त्री अधिकार संगठन , प्रगतिशील लेखक संघ, आल इंडिया लायर्स एसोशियेशन, जनवादी लेखक संघ, बीमा कर्मचारी यूनियन, गुक्टू, इप्टा सहित शहर के तमाम जनसंगठनों ने छः दिसंबर को सांप्रदायिकता और आतंकवाद विरोधी दिवस के रूप मे मनाते हुए फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा पर संयुक्त बैठक आयोजित की।


बैठक में इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने भारत तथा दुनिया भर में बढते आतंकवाद पर चिंता जताते हुए कहा कि इसके मूल में आर्थिक विषमतायें ही प्रमुख हैं। अजय गुलाटी ने विषय की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि आज अंबेडकर की पुण्यतिथि है और उन्होंने बहुत पहले धर्म के अमानवीय स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा था कि अगर कभी हिन्दु राष्ट्र बना तो वह दलितों और महिलाओं के लिये विनाशकारी होगा। अशोक पाण्डेय ने कहा कि इस धार्मिक राजनीति के केन्द्र में न मनुष्य है न इश्वर बस सत्ता है। आज़ादी के पहले मुस्लिम लीग और आर एस एस दोनों अंग्रेज़ों की सहयोगी थीं और बाद में देशभक्त हो गयीं। डा प्रवीण नीखरा ने शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन पर ज़ोर दिया तो ज्योति कुमारी तथा किरन ने धर्म के महिला विरोधी स्वरूप पर ध्यान खींचते हुए कहा कि हर दंगा स्त्री के शरीर पर हमले से शुरु होता है।


डा पारितोष मालवीय, अशोक चौहान, जितेंद्र बिसारिया, पवन करण, राजवीर राठौर, ज़हीर कुरेशी, फ़िरोज़ ख़ान सहित अनेक लोगों ने बहस में हिस्सेदारी की। अंत में पास एक साझा प्रस्ताव में साम्प्रदायिकता विरोधी ताक़तों को मज़बूत करने तथा शीघ्र मंहगाई पर जनजागरण के लिये एक अभियान चलाने पर सहमति बनी।

6 टिप्‍पणियां:

  1. धार्मिक कट्टरपंथ तथा आतंकवाद एक दूसरे के पूरक हैं।

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  2. bahut hi acchi bat likhi hai aapne , aaj jarurat hai to ek aise samaj ki janha par dharm ki bat na ho, magar afsosh ki sir hum hindu log hi is per bahas karte hain koi aur kyon nahi,

    aapke jabab ka intjar rahega,

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  3. दुर्ग भिलाई प्रलेस के साथी इस अभियान में साथ हैं ।

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  4. तारकेश्वर भाई
    आप समस्या को ग़लत जगह से पकड रहे हैं। यह कोई सिर्फ़ हिन्दुओं का मामला नहीं है। जिस प्रगतिशील लेखक संघ का यह मंच है उसके संस्थापक सज़्ज़ाद ज़हीर साहब थे…शुरु में इससे जुडे लोगों में ढेर सारे मुस्लिम शायर ही थे। अब भी यहां कितने ही मुस्लिम हैं। दिल्ली के शमसुल इस्लाम को तो आप जानते ही होंगे। हर तरह की सांप्रदायिकता के वे ख़िलाफ़ हैं और संघर्षरत भी। जावेद अख़्तर जैसे स्टार लोगों को तो लोग जानते हैं पर गांव शहरों में संघर्षरत तमाम लोग लाईमलाईट से दूर रहकर यह काम कर रहे हैं।

    मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-स्टालिन-माओ-चे ये तो हिन्दू नहीं थे? पर धर्म और अन्य उत्पीडक संरचनाओं के विरुद्ध इनकी लडाई क्या कोई भूल सकता है? असल में धर्म के ख़िलाफ़ लडाई तो पश्चिम के पुनर्जागरण के दौरान ही हुई।

    लेकिन यह भी सच है कि भारत में बहुसंख्यक होने के नाते हिन्दुओं की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है। क्योंकि बहुसंख्यक की सांप्रदायिकता अक्सर फासीवाद को जन्म देती है।

    रहा सवाल मेरा तो भाई अपना कोई धर्म नहीं है।

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  5. Rajasthan Pragatisheel Lekhak Sangh, Jaipur ka daak ka pata kripya suchit kare. Athwa fretbeats@gmail.com par mail bhi kar sakte hain. Main kuchh jaankari chahta hu.

    Dhanyawad

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  6. Hi,

    I am ashok ask, i want to register in the organization, please give me the guidelines regarding it.

    Thanks!

    Ashok Ask

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