शुक्रवार, 23 मार्च 2012
सोमवार, 13 फ़रवरी 2012
बुधवार, 25 जनवरी 2012
रविवार, 22 जनवरी 2012
ताशकंद-प्रसंग / महेंद्रभटनागर

ताशकंद-प्रसंग
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महेंद्रभटनागर
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महेंद्रभटनागर
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‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ में हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्यापन-हेतु, मेरे नाम पर विचार होगा; ऐसा कभी सोचा न था!
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एक दिन, अचानक, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’, नई दिल्ली के सचिव का एक लिफ़ाफ़ा मिला; जिसमें ‘विक्रम विश्वविद्यालय’, उज्जैन के कुलपति को भेजे गये पत्र (16-17 जून 1977) की प्रतिलिपि थी :
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Dear Vice-Chancellor,
The Tashkant State University, USSR proposes to invite a few Indian specialists in Hindi Language & Literature and Urdu Language & Literature of work at that University. The assignment will be initially for a period of two years, extendable by mutual consent. Appointments will be made on deputation and the selected teachers will have the option to carry their own scale of pay and draw the same pay as they would have drawn in India. Other allowances and facilities will include foreign allowances, children allowance, furnished accommodation, medical facilities and to and fro air passage for the scholar and family (spouse and up to three dependent children only). The candidates would be required to appear before a Selection Committee for personal interview.
The ICCR had requested the University Grants Commission to intimate some teachers for this purpose. The UGC panel on Modern Indian languages has recommended Dr. Mahendra Bhatnagar, Government Postgraduate College, Mandsaur (M.P.) to be considered for assignment in USSR.
The University Grants Commission will be grateful if you kindly let me know whether you would agree to the above teacher being nominated for this purpose. If so, his bio-data in triplicate may be sent to the University Grants Commission urgently.
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Yours Sincerely,
R.K.Chhabra, Secretary : UGC
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यह पत्र मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। इन दिनों मैं ‘शासकीय महाविद्यालय, मंदसौर’; में प्रोफ़ेसर और हिन्दी-विभागाध्यक्ष था। कुछ दिन बाद ही, ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति का पत्र (20 जून 1977) आया :
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प्रिय महेन्द्र,
अभी मैं 13 जून को, ताशकंद विश्वविद्यालय में हिन्दी और उर्दू के प्रोफ़ेसरों की नियुक्ति के संबंध में दिल्ली गया था। वहाँ मैंने संयोग से तुम्हारे नाम की सिफ़ारिश कर दी और आज मुझे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव के पत्र से मालूम हुआ कि तुम उसके लिए चुन लिए गए हो। यह नियुक्ति शुरू में दो वर्ष के लिए होती है। इस संबंध में मुझसे तुम्हारी स्वीकृति माँगी गई है। अतएव तुम मुझे लौटती डाक से सूचित करो कि इस संबंध में तुम्हारी क्या मंशा है और यदि स्वीकार हो तो अपने संक्षिप्त जीवन-विवरण की तीन प्रतियाँ शीघ्रातिशीघ्र भेज दो।
आशा है, स्वस्थ और सानंद होगे। सस्नेह —
तुम्हारा सदा का,
(शिवमंगलसिंह ‘सुमन’)
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स्वीकृति-पत्र और स्ववृत्त ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति को जून 1977 माह में ही भेज दिया। तदनुसार, ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति ने ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के सचिव को सूचित कर दिया (30 जून 1977 का पत्र):
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Dear Shri Chhabra,
Please refer to your D.O. No. F. 19-20/76 (CE) dated June 17, 1977, informing me about the selection of Dr, Mahendra Bhatnagar of Government Post Graduate College, Mandsaur, as specialist in Hindi language and literature in the Tashkant State University (USSR). He has accepted the offer and as desired, I am sending his bio-data, in triplicate, for necessary action at your end. With kind regards & thanks,
Yours sincerely / (S.M. Singh 'Suman')
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इस स्तर पर, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ का काम पूरा हो गया। अब सीधा संबंध ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली’ (ICCR) से प्रारम्भ हुआ। इस ‘परिषद्’ के उप-सचिव का, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के पत्र के समान ही, एक पत्र (अगस्त, 20, 1977) प्राप्त हुआ। ‘भा.सां.सं. परिषद’ को भी वांछित समस्त विवरण प्रेषित किये। निर्धारित प्रपत्र (क्र. 0072) भर कर भेजा।
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ऐसा लगा, ताशकंद जाना है। बड़े उत्साह से, रूसी भाषा पढ़नी-लिखनी सीखनी शुरू की। ‘रूसी-हिन्दी’ की कई पुस्तकें जगह-जगह से प्राप्त कीं। डा. भोलानाथ तिवारी जी से दिल्ली में मिला। उन्हीं के बाद, मुझे ताशकंद जाना था। डा. भोलानाथ तिवारी जी ने ताशकंद के अपने अनेक रोचक संस्मरण खुलकर सुनाये और राय दी कि मैं हिन्दी-व्याकरण बहुत अच्छी तरह से पढ़-समझ कर ही ताशकंद जाऊँ! उनके पूर्व, ताशकंद डा. रामकुमार वर्मा जी रह चुके थे। डा. रामकुमार वर्मा जी की भी, ताशकंद-संबंधी कुछ बातें उन्होंने बतायीं; जिससे वैसी भूलें मुझसे न हों।
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ताशकंद जाने का प्रस्ताव कोई गोपनीय तो था नहीं; अतः घनिष्ठ मित्रों को भी बताया।
पर्याप्त प्रतीक्षा के बाद, अचानक, अक्टूबर 1978 में, विदेश-मंत्रालय, नई दिल्ली के हिन्दी-अधिकारी श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी का निजी पत्र (दि. 16 अक्टूबर 1978) आया :
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प्रिय प्रो. महेंद्र भटनागर,
किसी प्रसंगवश अभी विदेश-मंत्री जी से चर्चा चली तो विदेश-मंत्री जी ने यह इच्छा प्रकट की कि आप कभी दिल्ली आ सकें तो अच्छा हो। मेरा अनुमान है कि विदेश-मंत्री जी दीपावली के पहले तक दिल्ली में हैं, सिर्फ 20 और 21 अक्टूबर को छोड़ कर। फिर भी, मेरा निवेदन है कि आप अपने दिल्ली आगमन की पूर्व सूचना मुझे भेज दें ताकि आपको विदेश-मंत्री जी से, दिल्ली आने पर, मिलने में कोई असुविधा न हो।
आपका
(बच्चूप्रसाद सिंह)
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सर्वविदित है, इन दिनों, विदेश-मंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी थे। श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी के पत्र का संदर्भ ताशकंद-प्रसंग होगा; ऐसा अनुमान सहज ही प्रतीत हुआ। उनका यह पत्र स्वयं में उत्साहवर्द्धक था।
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श्री अटलबिहारी जी के अल्पकालीन संसर्ग की पुरानी स्मृतियाँ ताज़ी हो गयीं। तैंतीस वर्षों से, किसी प्रकार का संबंध-सम्पर्क न होने पर भी मेरा स्मरण उन्हें रहा; इससे अपूर्व हर्ष और अपार तोष हुआ। भारत सरकार में विदेश-मंत्री होते हुए; उनका मुझसे मिलने की इच्छा प्रकट करना, उनके मानवीय गुणों का परिचायक है। राजनीति और साहित्य में ख्याति-लब्ध श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी से, इतने लम्बे अंतराल-बाद, मिलने दिल्ली जाना, सचमुच, मेरे लिए बड़ा रोमांचक था।
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निर्दिष्ट तिथियों को ध्यान में रख कर, शीघ्र ही, दिल्ली रवाना हुआ। दिल्ली में सर्वप्रथम पंडारा रोड-स्थित श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी के निवास पर पहुँचा। अपने पत्र भेजने का कारण उन्होंने बताया –
“फ़ाइल जब विदेश-मंत्री जी के समक्ष रखी तो उसे देख कर वे बोले —
‘डा. महेन्द्रभटनागर को जानते हैं ?’
मैंने कहा, ‘नहीं।’
वे तुरन्त बोले, ‘मैं जानता हूँ।’
इस पर मैंने कहा — ‘तो फिर निपटाइए; फ़ाइल बहुत दिनों से पड़ी है।’
इस पर उन्होंने कहा — ‘ऐसे नहीं। उन्हें बुलवाइए।’
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विदेश-मंत्री से मेरी भेंट अनौपचारिक व व्यक्तिगत थी। उसका कोई रिकार्ड नहीं रखा गया।
अगले दिन, निश्चित समय पर, ‘साउथ एवेन्यू’ पहुँचा। श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी ने, विदेश मंत्री के कक्ष तक पहुँचाया। साथ में, दिल्ली-निवासी मेरे अनुज डा. वीरेन्द्र भटनागर भी थे (भौतिकी के यशस्वी लेखक व प्रोफ़ेसर)। दिल्ली-जैसे महानगर में, मैं अकेला घूम-फिर नहीं सकता।
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वाजपेयी जी मिल गये।
औपचारिक अभिवादन-बाद; भाई का परिचय करवाया। सहज हलकी मुसकान उनके चेहरे पर बनी रही।
मैंने अपनी कविताओं के अंग्रेज़ी-काव्यानुवादों की दो ज़िल्दें उन्हें भेंट में दीं —
‘Forty Poems Of Mahendra Bhatnagar’
‘After The Forty Poems’
कुछ पृष्ठ वाजपेयी जी ने उलट-पलट कर देखे; हमारी उपस्थिति में।
‘ताशकंद’ की कोई चर्चा नहीं की।
तीन-दशक से अधिक-बाद मिला था। बातचीत में मर्यादा का ध्यान बराबर बना रहा। चाहता तो अधिक देर रुकता; विनोद-प्रसंग भी आते; अतीत का स्मरण भी करते। किन्तु डर था; अवांछित न कह बैठूँ ! ताशकंद जाने की स्वीकृति का प्रश्न था। इस अवसर पर अधिक आज़ादी से बात करना युक्तियुक्त न समझा।
भेंट गरिमापूर्ण और सार्थक रही।
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रात में श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी ने फ़ोन पर, कार्यसिद्धि का संकेत दिया।
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ताशकंद जाना सुनिश्चित हुआ। यथासमय, ग्वालियर लौट आया। श्री अटल जी से चूँकि उन्मुक्त वार्ता नही हो सकी; अतः कुछ रह गया; महसूस करता रहा !
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सन् 1978 गुज़रे कई माह बीत गये। ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ से कोई सूचना नहीं आयी। जून 1979 में दिल्ली गया। ‘परिषद’ कार्यालय में चेयर्स के प्रभारी श्री सरकार से मिला। उन्होंने बताया — सब ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ भेजा जा चुका है। आमंत्रण कभी भी आ सकता है। उसके बाद, चलने की तैयारी करें।
सरकार साहब ने बताया — समाजवादी देश अक्सर विलम्ब करते हैं। चलते समय, उन्होंने शीघ्र स्मरण-पत्र भेज देने का वचन दिया।
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लेकिन, फिर अनेक माह गुज़र गये। कहीं से कोई सूचना नहीं।
सन् 1979 के लगभग अंत में, पुनः ‘परिषद्’ कार्यालय पहुँचा। सरकार साहब ने बताया — ‘आपका प्रकरण ‘ठंडे-बस्ते’ में चला गया ! ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ के कुलपति का ताज़ा टेलेक्स आया है कि इन दिनों ताशकंद में आवासीय स्थान की तंगी है, अतः फिलहाल इस योजना को स्थगित कर रखा है।’
सरकार साहब ने कहा, ‘सोवियत संघ से आगे यदि कभी भी प्राध्यापकों की माँग आयी तो हम नया चयन नहीं करेंगे; आपको ही भेजेंगे।’
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अफ़सोस तो हुआ; लेकिन निराशा नहीं।
बाद में पता चला; डा. भोलानाथ तिवारी जी के बाद से, कोई भी हिन्दी-प्रोफ़ेसर ताशकंद नहीं गया। ताशकंद से ही, हिन्दी-अध्यापक और छात्र, हिन्दी भाषा और साहित्य का ज्ञान प्राप्त करने, ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली’ आते रहे; प्रवेश लेते रहे।
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माना, ताशकंद-प्रकरण ‘टाँय-टाँय फिस’ हो गया ! अर्थात् ‘लम्बी बातें, पर परिणाम कुछ नहीं ! धूमधाम से काम शुरू करना, पर अंत में, कुछ न हो सकना !’
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लेकिन जो हुआ; स्वयं में वह एक उपलब्धि है। इसे याद रखना चाहता हूँ। सबको बताना चाहता हूँ।
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डा. महेंद्रभटनागर,
110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर — 474 002 [म.प्र.]
फ़ोन : 0751 - 4092908
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एक दिन, अचानक, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’, नई दिल्ली के सचिव का एक लिफ़ाफ़ा मिला; जिसमें ‘विक्रम विश्वविद्यालय’, उज्जैन के कुलपति को भेजे गये पत्र (16-17 जून 1977) की प्रतिलिपि थी :
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Dear Vice-Chancellor,
The Tashkant State University, USSR proposes to invite a few Indian specialists in Hindi Language & Literature and Urdu Language & Literature of work at that University. The assignment will be initially for a period of two years, extendable by mutual consent. Appointments will be made on deputation and the selected teachers will have the option to carry their own scale of pay and draw the same pay as they would have drawn in India. Other allowances and facilities will include foreign allowances, children allowance, furnished accommodation, medical facilities and to and fro air passage for the scholar and family (spouse and up to three dependent children only). The candidates would be required to appear before a Selection Committee for personal interview.
The ICCR had requested the University Grants Commission to intimate some teachers for this purpose. The UGC panel on Modern Indian languages has recommended Dr. Mahendra Bhatnagar, Government Postgraduate College, Mandsaur (M.P.) to be considered for assignment in USSR.
The University Grants Commission will be grateful if you kindly let me know whether you would agree to the above teacher being nominated for this purpose. If so, his bio-data in triplicate may be sent to the University Grants Commission urgently.
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Yours Sincerely,
R.K.Chhabra, Secretary : UGC
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यह पत्र मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। इन दिनों मैं ‘शासकीय महाविद्यालय, मंदसौर’; में प्रोफ़ेसर और हिन्दी-विभागाध्यक्ष था। कुछ दिन बाद ही, ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति का पत्र (20 जून 1977) आया :
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प्रिय महेन्द्र,
अभी मैं 13 जून को, ताशकंद विश्वविद्यालय में हिन्दी और उर्दू के प्रोफ़ेसरों की नियुक्ति के संबंध में दिल्ली गया था। वहाँ मैंने संयोग से तुम्हारे नाम की सिफ़ारिश कर दी और आज मुझे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव के पत्र से मालूम हुआ कि तुम उसके लिए चुन लिए गए हो। यह नियुक्ति शुरू में दो वर्ष के लिए होती है। इस संबंध में मुझसे तुम्हारी स्वीकृति माँगी गई है। अतएव तुम मुझे लौटती डाक से सूचित करो कि इस संबंध में तुम्हारी क्या मंशा है और यदि स्वीकार हो तो अपने संक्षिप्त जीवन-विवरण की तीन प्रतियाँ शीघ्रातिशीघ्र भेज दो।
आशा है, स्वस्थ और सानंद होगे। सस्नेह —
तुम्हारा सदा का,
(शिवमंगलसिंह ‘सुमन’)
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स्वीकृति-पत्र और स्ववृत्त ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति को जून 1977 माह में ही भेज दिया। तदनुसार, ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ के कुलपति ने ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के सचिव को सूचित कर दिया (30 जून 1977 का पत्र):
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Dear Shri Chhabra,
Please refer to your D.O. No. F. 19-20/76 (CE) dated June 17, 1977, informing me about the selection of Dr, Mahendra Bhatnagar of Government Post Graduate College, Mandsaur, as specialist in Hindi language and literature in the Tashkant State University (USSR). He has accepted the offer and as desired, I am sending his bio-data, in triplicate, for necessary action at your end. With kind regards & thanks,
Yours sincerely / (S.M. Singh 'Suman')
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इस स्तर पर, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ का काम पूरा हो गया। अब सीधा संबंध ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली’ (ICCR) से प्रारम्भ हुआ। इस ‘परिषद्’ के उप-सचिव का, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के पत्र के समान ही, एक पत्र (अगस्त, 20, 1977) प्राप्त हुआ। ‘भा.सां.सं. परिषद’ को भी वांछित समस्त विवरण प्रेषित किये। निर्धारित प्रपत्र (क्र. 0072) भर कर भेजा।
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ऐसा लगा, ताशकंद जाना है। बड़े उत्साह से, रूसी भाषा पढ़नी-लिखनी सीखनी शुरू की। ‘रूसी-हिन्दी’ की कई पुस्तकें जगह-जगह से प्राप्त कीं। डा. भोलानाथ तिवारी जी से दिल्ली में मिला। उन्हीं के बाद, मुझे ताशकंद जाना था। डा. भोलानाथ तिवारी जी ने ताशकंद के अपने अनेक रोचक संस्मरण खुलकर सुनाये और राय दी कि मैं हिन्दी-व्याकरण बहुत अच्छी तरह से पढ़-समझ कर ही ताशकंद जाऊँ! उनके पूर्व, ताशकंद डा. रामकुमार वर्मा जी रह चुके थे। डा. रामकुमार वर्मा जी की भी, ताशकंद-संबंधी कुछ बातें उन्होंने बतायीं; जिससे वैसी भूलें मुझसे न हों।
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ताशकंद जाने का प्रस्ताव कोई गोपनीय तो था नहीं; अतः घनिष्ठ मित्रों को भी बताया।
पर्याप्त प्रतीक्षा के बाद, अचानक, अक्टूबर 1978 में, विदेश-मंत्रालय, नई दिल्ली के हिन्दी-अधिकारी श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी का निजी पत्र (दि. 16 अक्टूबर 1978) आया :
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प्रिय प्रो. महेंद्र भटनागर,
किसी प्रसंगवश अभी विदेश-मंत्री जी से चर्चा चली तो विदेश-मंत्री जी ने यह इच्छा प्रकट की कि आप कभी दिल्ली आ सकें तो अच्छा हो। मेरा अनुमान है कि विदेश-मंत्री जी दीपावली के पहले तक दिल्ली में हैं, सिर्फ 20 और 21 अक्टूबर को छोड़ कर। फिर भी, मेरा निवेदन है कि आप अपने दिल्ली आगमन की पूर्व सूचना मुझे भेज दें ताकि आपको विदेश-मंत्री जी से, दिल्ली आने पर, मिलने में कोई असुविधा न हो।
आपका
(बच्चूप्रसाद सिंह)
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सर्वविदित है, इन दिनों, विदेश-मंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी थे। श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी के पत्र का संदर्भ ताशकंद-प्रसंग होगा; ऐसा अनुमान सहज ही प्रतीत हुआ। उनका यह पत्र स्वयं में उत्साहवर्द्धक था।
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श्री अटलबिहारी जी के अल्पकालीन संसर्ग की पुरानी स्मृतियाँ ताज़ी हो गयीं। तैंतीस वर्षों से, किसी प्रकार का संबंध-सम्पर्क न होने पर भी मेरा स्मरण उन्हें रहा; इससे अपूर्व हर्ष और अपार तोष हुआ। भारत सरकार में विदेश-मंत्री होते हुए; उनका मुझसे मिलने की इच्छा प्रकट करना, उनके मानवीय गुणों का परिचायक है। राजनीति और साहित्य में ख्याति-लब्ध श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी से, इतने लम्बे अंतराल-बाद, मिलने दिल्ली जाना, सचमुच, मेरे लिए बड़ा रोमांचक था।
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निर्दिष्ट तिथियों को ध्यान में रख कर, शीघ्र ही, दिल्ली रवाना हुआ। दिल्ली में सर्वप्रथम पंडारा रोड-स्थित श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी के निवास पर पहुँचा। अपने पत्र भेजने का कारण उन्होंने बताया –
“फ़ाइल जब विदेश-मंत्री जी के समक्ष रखी तो उसे देख कर वे बोले —
‘डा. महेन्द्रभटनागर को जानते हैं ?’
मैंने कहा, ‘नहीं।’
वे तुरन्त बोले, ‘मैं जानता हूँ।’
इस पर मैंने कहा — ‘तो फिर निपटाइए; फ़ाइल बहुत दिनों से पड़ी है।’
इस पर उन्होंने कहा — ‘ऐसे नहीं। उन्हें बुलवाइए।’
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विदेश-मंत्री से मेरी भेंट अनौपचारिक व व्यक्तिगत थी। उसका कोई रिकार्ड नहीं रखा गया।
अगले दिन, निश्चित समय पर, ‘साउथ एवेन्यू’ पहुँचा। श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी ने, विदेश मंत्री के कक्ष तक पहुँचाया। साथ में, दिल्ली-निवासी मेरे अनुज डा. वीरेन्द्र भटनागर भी थे (भौतिकी के यशस्वी लेखक व प्रोफ़ेसर)। दिल्ली-जैसे महानगर में, मैं अकेला घूम-फिर नहीं सकता।
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वाजपेयी जी मिल गये।
औपचारिक अभिवादन-बाद; भाई का परिचय करवाया। सहज हलकी मुसकान उनके चेहरे पर बनी रही।
मैंने अपनी कविताओं के अंग्रेज़ी-काव्यानुवादों की दो ज़िल्दें उन्हें भेंट में दीं —
‘Forty Poems Of Mahendra Bhatnagar’
‘After The Forty Poems’
कुछ पृष्ठ वाजपेयी जी ने उलट-पलट कर देखे; हमारी उपस्थिति में।
‘ताशकंद’ की कोई चर्चा नहीं की।
तीन-दशक से अधिक-बाद मिला था। बातचीत में मर्यादा का ध्यान बराबर बना रहा। चाहता तो अधिक देर रुकता; विनोद-प्रसंग भी आते; अतीत का स्मरण भी करते। किन्तु डर था; अवांछित न कह बैठूँ ! ताशकंद जाने की स्वीकृति का प्रश्न था। इस अवसर पर अधिक आज़ादी से बात करना युक्तियुक्त न समझा।
भेंट गरिमापूर्ण और सार्थक रही।
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रात में श्री बच्चूप्रसाद सिंह जी ने फ़ोन पर, कार्यसिद्धि का संकेत दिया।
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ताशकंद जाना सुनिश्चित हुआ। यथासमय, ग्वालियर लौट आया। श्री अटल जी से चूँकि उन्मुक्त वार्ता नही हो सकी; अतः कुछ रह गया; महसूस करता रहा !
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सन् 1978 गुज़रे कई माह बीत गये। ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ से कोई सूचना नहीं आयी। जून 1979 में दिल्ली गया। ‘परिषद’ कार्यालय में चेयर्स के प्रभारी श्री सरकार से मिला। उन्होंने बताया — सब ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ भेजा जा चुका है। आमंत्रण कभी भी आ सकता है। उसके बाद, चलने की तैयारी करें।
सरकार साहब ने बताया — समाजवादी देश अक्सर विलम्ब करते हैं। चलते समय, उन्होंने शीघ्र स्मरण-पत्र भेज देने का वचन दिया।
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लेकिन, फिर अनेक माह गुज़र गये। कहीं से कोई सूचना नहीं।
सन् 1979 के लगभग अंत में, पुनः ‘परिषद्’ कार्यालय पहुँचा। सरकार साहब ने बताया — ‘आपका प्रकरण ‘ठंडे-बस्ते’ में चला गया ! ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ के कुलपति का ताज़ा टेलेक्स आया है कि इन दिनों ताशकंद में आवासीय स्थान की तंगी है, अतः फिलहाल इस योजना को स्थगित कर रखा है।’
सरकार साहब ने कहा, ‘सोवियत संघ से आगे यदि कभी भी प्राध्यापकों की माँग आयी तो हम नया चयन नहीं करेंगे; आपको ही भेजेंगे।’
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अफ़सोस तो हुआ; लेकिन निराशा नहीं।
बाद में पता चला; डा. भोलानाथ तिवारी जी के बाद से, कोई भी हिन्दी-प्रोफ़ेसर ताशकंद नहीं गया। ताशकंद से ही, हिन्दी-अध्यापक और छात्र, हिन्दी भाषा और साहित्य का ज्ञान प्राप्त करने, ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली’ आते रहे; प्रवेश लेते रहे।
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माना, ताशकंद-प्रकरण ‘टाँय-टाँय फिस’ हो गया ! अर्थात् ‘लम्बी बातें, पर परिणाम कुछ नहीं ! धूमधाम से काम शुरू करना, पर अंत में, कुछ न हो सकना !’
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लेकिन जो हुआ; स्वयं में वह एक उपलब्धि है। इसे याद रखना चाहता हूँ। सबको बताना चाहता हूँ।
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डा. महेंद्रभटनागर,
110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर — 474 002 [म.प्र.]
फ़ोन : 0751 - 4092908
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011
जंग के मारे हुए ख्वाब जिया करते हैं प्रलेस ने किया काव्य पाठ का आयोजन
इंदौर। प्रेमचंद की अगुआई में तरक्कीपसंद तहरीक ने हमेशा ही कवियों और शायरों को एक रास्ता दिखाया है। समाजिक बदलाव के लिए समाजी जंग छेड़ने के काम में आज भी यही पहलू हमारी शायरी का एक अहम हिस्सा बना हुआ है। हम इससे मुंह नहीं मोड़ सकते। यह कहना है प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मंडल के सदस्य डॉ॰ अजीज इंदौरी का। वे इंदौर इकाई द्वारा आयोजित शहर के चार कवियों के रचनापाठ कार्यक्रम में शायरी की रवायत के सिलसिले पर रौशनी डाल रहे थे। इस मौक पर डॉ॰ अजीज अंसारी, इहसाक असर, ब्रजेश क़ानूनगो व युवा कवि नवीन रांगियाल ने कविता पाठ किया। अजीज इंदौरी ने कहा कि अमीर हनफी शहर में तरक्की पसंद तहरीक के बड़े शायर हुए। उन्होंने कहा कि समाजी सरोकार से विहीन कविता से कुछ हासिल नहीं होता। उद्देश्यहीन व दिशाहीन साहित्य किस तरह हल्का हो जाता है इसकी उदाहरण हम आजकल होने वाले मुशायरों व कवि सम्मेलनों में देख सकते हैं। ये मुशायरे तीन पायों पर टिके रहते हैं। पहला फायनेंसर, दूसरा वे लोग जो इनमें शायरों और कवियों को बुलाते हैं और तीसरे मुशायरों को सुनने वाले। जो लोग फायनेंसर हैं उनका शायरी से कोई सरोकार नहीं हैं। जिन्हें शायरों को बुलाने का काम सौंपा गया है वे अपनी समझ और नेटवर्क के लोगों को इसमें शामिल करते हैं। इन दोनों के सहयोग से हुए मुशायरे को जो लोग सुनने जाते हैं। उन्हें इन दोनों को झेलना होता है। इस मौके पर अजीज साहब ने अपनी शायरी जंग तथा जाने क्या क्या बोल रही हूं सुनाई।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. हदीस अंसारी ने किया। कार्यक्रम में याकूब साकी, तारीक शाहीन, फरयाद बहादुर, अजीज इरफान, संजय पटेल, सुबोध्ा होलकर, राजकुमार कुंभज, केसरी सिंह चिढार, प्रो. जाकिर हुसैन, भारत सक्सेना, राजेश पाटील, अमित श्रीवास्तव, चुन्नीलाल वाधवानी आदि शामिल थ्ो।
प्रो. अजीज इंदौरी की कविता जंग
जंग िफर जंग है जंग से मिलता क्या है
राख के ढेर में शोलों के अलावा क्या है
राख को कोई कुरेदे तो भड़कते शोले,
िफक्रो अहसास को जला देते हैं
सारे मंसूबों को मिट्टी में मिला देते हैं।
जंग की आग बड़ी तेज हुआ करती है
जंग के शोलों में तारीख जला करती है
जंग भूख और गरीबी बढ़ा देती है।
जंग इंसान को मुश्किल में फंसा देती है
जंग से सिर्फ अंध्ोरे ही मिला करते हैं
जंग के मारे हुए ख्वाब जिया करते हैं।
मैं जाने क्या क्या बोल रहा हूं
मैं जाने क्या क्या बोल रहा हूं
अक्सर मालूम हुआ है जैसे
अपने अंदर के राजों को खोल रहा हूं
िफक्रो नज़र की निजामों पर
जात को अपनी तोल रहा हूं।
मैं जाने क्या क्या बोल रहा हूं।
कार्यक्रम के दूसरे शायर इहसाक असर ने तरक्कीपसंद तहरीक के बारे में अपने ख़्यालात इस शेर से जाहिर किए।
हम उसकी राह से पत्थर हटाने आए हैं
ये दुनिया सोच रही है दीवाने आए हैं
हमारी िफक्र के अहसासमंद आइने
हमें अपना ही चेहरा दिखाने आए हैं
रजाई अब्र की मत ओढ़
चांद बाहर आ
सितारे तुम से निगाहें मिलाने आएं हैं।
उनका अगला शेर था
हम सोचते रहते तो हल भी निकलता
हम र्दीपक भी जलाते तो काजल निकलता
इस मौके पर कवि ब्रजेश क़ानूनगो ने ग्लोबल प्रोडक्ट, भूकंप के बाद, इस गणराज्य में आजादी, पत्थर कीघट्टी आदि कविताएं सुनाई जिसमें समय को बदलते हुए देखने की विवशता व असहायता के बीच झूलते एक आदमी की व्यथा दिखाई देती है।
पत्थर की घट्टी
पत्थर के वृत्ताकार ये दो शिल्प
जो निकल आए हैं खुदाई के दौरान
कुछ और नहीं
घट्टी के दो पाट हैं।
समय की कई परतों से
़ढ़की हुई थी यह घट्टी
जो निकल आई है, अभी अभी
छुपे हुए खजाने की तरह।
स्मृतियों का महीन आटा
दिखाई दे रहा है
इनके बीच से निकलता हुआ।
घर के एक कोने में
रखी होती थी कभी यह
पुरानी िफल्मों की हवेलियों मे जैसे
सजा होता है कोई पियानो।
घर आंगन के साथ होता था शृंगार इसका
बहन बां़धती थी राखी
इसके हत्ते पर
मिट्टी का दीपक जलाती थी मां
इसके पाटों पर
लक्षमी पूजन के समय।
प्रभातफेरी पर निकले सज्जनों के गान के साथ
शुरू होता था दादी का घट्टी घुमाना
लोरी की तरह फूट प़ड़ती थी ग़ड़ग़ड़ाहट
जो नींद के सुखद संसार में िफर से ले जाती थी
जागते हुए बच्चों को।
भूकंप के बाद कविता
भूकंप के बाद
एक और भूकंप आता है हमारे अंदर।
विश्वास की चट्टानें
बदलती है अपना स्थान
खिसकने लगती है विचारों की आंतरिक plate
मन के महासागर में उम़ड़ती है संवेदनाओं की सुनामी लहरें
तब होता है जन्म कविता का।
भाषा शिल्प और शैली का
नही होता कोई विवाद
मात्राओं की संख्या
और शब्दों के वजन का कोई मापदंड
नहीं बनता बा़धक
वि़धा के अस्तित्व पर नहीं होता कोई प्रश्नचिन्ह्
चिंता नहीं होती सृजन के स्वीकार की।
अनप़ढ़ किसान हो या गरीब मछुआरा
या िफर चमकती दुनिया का दैदीप्य सितारा
रचने लगते हैं कविता।
कविता ही है जो
मलबे पर खिलाती है फूल
बिछु़ड़ गए बच्चों के चेहरों पर
लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नईबस्ती की हवाओं मे
सिकते हुए अन्न की खुशबू।
अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करतीं
पुस्तकों में नहीं
जीवन में बसती है कविताएं।
गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह
कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आंखें
न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौ़धरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का संदेश
आजाद हिंद फौज का कोई सिपाही
स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में क़ैद है
देवकीनंदन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह
स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
युवा कवि नवीन रांग्याल ने अश्वथामा ने कहा था, िफरकती लड़कियों में, किस्तों के सहारे व शेरी, कोन्याक िस्लबों वित्से नामक कविताएं सुनाई।
िफरकती ल़ड़कियों में
बोरियत से भरी गरमियों की
उन तमाम बोझिल दोपहरों में
कुछ minutes की आराम तलब
झपकी लेने के बजाऐ
घंटों इंटरनेट पर
तुम्हे खोजता रहा.
गूगल की उस विशालकार
समुद्रीय टेक्नोलॉजी पर भी
तुम मुझे नहीं मिली.
और में कई दोपहरों में
की - बोर्ड पर
तुम्हारी आवाजें तलाशता रहा.
कई आईने बनाए
ह़ज़ारों चहरें उलटता
और पलटता रहा रात भर।
द्वारा
केसरी सिंह चिढार, 9425312544
मंगलवार, 13 दिसंबर 2011
कवि महेंद्रभटनागर
कवि महेंद्रभटनागर
— डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
हिंदी साहित्येतिहास में कवि महेंद्रभटनागर
की पहचान प्रगतिशील काव्य-धारा और गीति-रचना के अन्तर्गत स्पष्ट बन चुकी है। वे एक
स्थापित कवि हैं — स्वातंत्र्योत्तर
हिंदी कविता के यशस्वी हस्ताक्षर। उन्हें प्रगतिवादी काव्य-धारा के द्वितीय उत्थान
का केन्द्रीय कवि माना जाता है। सन् 1946 के आसपास उन्होंने
‘हंस’ में लिखना प्रारम्भ
किया। ‘हंस’ से उन्हें प्रगतिशील
कविता की पहचान मिली। ‘हंस’ एवं अन्य तत्कालीन
पत्र-पत्रिकाओं में वे प्रमुखता से प्रकाशित हुए। यथा —‘जनवाणी’, ‘रक्ताभ’, ‘नया साहित्य’, ‘नया पथ’, ‘जनयुग’ आदि तमाम पत्र-पत्रिकाओं
में। महेंद्रभटनागर की प्रांजल काव्य-सृष्टि ने तत्कालीन लब्ध-प्रतिष्ठ कवियों और समालोचकों
का ध्यान आकृष्ट किया। उनकी काव्य-सृष्टि के विविध पक्षों पर पर्याप्त विमर्श हुआ है; जो अनेक सम्पादित
आलोचना-कृतियों में उपलब्ध है। हिंदी के कवि और आलोचकों ने महेंद्रभटनागर की कविता
पर जो विचार व मन्तव्य प्रकट किये वे विचारोत्तेजक हैं। इनसे उनकी लोकप्रियता का बोध
ही नहीं होता; वे गहन व विस्तृत
परीक्षण के लिए भी अन्वेषकों और प्रबुद्ध पाठकों को उकसाते हैं। कतिपय कवियों-आलोचकों
की धारणाओं को यहाँ उद्धृत करना आवश्यक है।
महेंद्रभटनागर की प्रथम काव्य-कृति ‘टूटती शृंखलाएँ’ सन् 1949 में प्रकाशित हुई।
इस कृति पर यशस्वी कवि डा. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का कथन महत्त्व रखता
है। ‘सुमन’ जी ने लिखा:
‘‘युग की अस्त-व्यस्त
मानसिक दशा तथा अप्रतिहत संघर्ष की जागरूक वाणी के उन्मेषशील स्वर इसकी झंकार में समाहित
हैं। महेंद्रभटनागर की आतुर निर्भीक व्यंजना तथा कलात्मक गढ़न, प्रगतिशील काव्य के
स्वर्णिम भविष्य की ओर संकेत करती है। कवि में जन-संस्कृति के नव-निर्माण की जो अदम्य
आस्था है, वह उसके स्वर को और
सबल तथा साधनापरक बनाती है। हिंदी के वर्तमान कवियों में उसने सहज ही गौरवपूर्ण स्थान
बना लिया है। युग की वाणी उसके कंठ में ढलकर जन-जीवन के अश्रु-हास की सजीव गाथा बन
गयी है। ‘टूटती शृंखलाएँ’ संक्रमण-युग के युगान्तरकारी
काव्य की भूमिका बनकर आयी है और निःसंदेह भावी समाज के अधिकांश भावात्मक उपकरण उसमें
अंकुर रूप में देखे जा सकते हैं।’’
‘टूटती शृंखलाएँ’ पर लिखित श्री. गजानन
माधव मुक्तिबोध की समीक्षा भी अपने में विशिष्ट है; जिसमें उनके कविता-कर्म को सप्तक-कवियों के समकक्ष रखने की ध्वनि निहित है:
‘‘तरुण कवि वर्तमान
युग के कष्ट, अंधकार, बाधाएँ, संघर्ष, प्रेरणा और विश्वास
लेकर जन्मा है। उसके अनुरूप उसकी काव्य-शैली भी आधुनिक है। इस तरह वह ‘तार-सप्तक’ के कवियों की परम्परा
में आता है; जिन्होंने सर्वप्रथम हिन्दी-काव्य की छायावादी प्रणाली
को त्याग कर नवीन भावधारा के साथ-साथ नवीन अभिव्यक्ति शैली को स्वीकृत किया है। इस
शैली की यह विशेषता है कि नवीन विषयों को लेने के साथ-साथ नवीन उपकरणों को और नवीन
उपमाओं को भी लिया जाता है तथा काव्य को हमारे यथार्थ जीवन से संबंधित कर दिया जाता
है। इसे हम वस्तुवादी मनोवैज्ञानिक काव्य कह सकते हैं। इस अत्याधुनिक के समीप और उसका
भाग बनकर रहते हुए भी कवि की अभिव्यक्ति शैली में दुरूहता नहीं आ पायी। भाषा में रवानी, मुक्त छंदों का गीतात्मक
वेग और अभिव्यक्ति की सरलता,
काव्य-शास्त्रीय शब्दावली
में कहा जाय तो माधुर्य और प्रसाद गुण महेन्द्रभटनागर की उत्तरकालीन कविताओं की विशेषता
है। किन्तु सबसे बड़ी बात यह है,
जो उन्हें पिटे-पिटाये
रोमाण्टिक काव्य-पथ से अलग करती है और ‘तार-सप्तक’ के कवियों से जा मिलाती
है वह यह है कि अत्याधुनिक भावधारा के साथ टेकनीक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से उनका
उत्तरकालीन काव्य Modernistic या अत्याधुनिकतावादी
हो जाता है। उसका प्रभाव हृदय पर स्थायी रूप से पड़ जाता है। श्री महेन्द्र भटनागर वर्तमान
युग-चेतना की उपज हैं।’’
सन् 1953 में महेंद्रभटनागर
की अन्य काव्य-कृति ‘बदलता युग’ प्रकाश में आयी; जिसकी भूमिका प्रोफ़ेसर
प्रकाशचंद्र गुप्त ने लिखी। इस कृति को लक्ष्य करते हुए डा. रामविलास शर्मा ने अपना
अति महत्त्वपूर्ण अभिमत अंकित किया:
कवि महेन्द्रभटनागर की सरल, सीधी ईमानदारी और
सचाई पाठक को बरबस अपनी तरफ़ खींच लेती है। प्रयोग के लिए प्रयोग न करके, अपने को धोखा न देकर
और संसार से उदासीन होकर संसार को ठगने की कोशिश न करके इस तरुण कवि ने अपनी समूची
पीढ़ी को ललकारा है कि जनता के साथ खड़े होकर नयी ज़िन्दगी के लिए अपनी आवाज़ बुलन्द करे।
महेन्द्रभटनागर की रचनाओं में तरुण और उत्साही
युवकों का आशावाद है, उनमें नौजवानों का
असमंजस और परिस्थितियों से कुचले हुए हृदय का अवसाद भी है। इसी लिए कविताओं की सचाई
इतनी आकर्षक है। यह कवि एक समूची पीढ़ी का प्रतिनिधि है जो बाधाओं और विपत्तियों से
लड़कर भविष्य की ओर जाने वाले राजमार्ग का निर्माण कर रहा है।
महेन्द्रभटनागर की कविता सामयिकता में डूबी
हुई है। वह एक ऐसी जागरूक सहृदयता का परिचय देते हैं जो अशिव और असुन्दर के दर्शन से
सिहर उठती है तो जीवन की नयी कोंपलें फूटते देख कर उल्लसित भी हो उठती है।
कवि के पास अपने भावों के लिये शब्द हैं, छंद हैं, अलंकार हैं। उसके
विकास की दिशा यथार्थ जीवन का चितेरा बनने की ओर है। साम्प्रदायिक द्वेष, शासक वर्ग के दमन, जनता के शोक और क्षोभ
के बीच सुन पड़ने वाली कवि की इस वाणी का स्वागत —
‘जो गिरती दीवारों पर नूतन जग का सृजन करे
वह जनवाणी
है !
वह युगवाणी है !
‘नयी चेतना’ (प्रकाशन सन् 1956) और ‘जिजीविषा’ (प्रकाशन सन् 1960) महेंद्रभटनागर की
प्रमुख प्रगतिवादी काव्य-रचनाएँ हैं। प्रगतिशील कविता का अध्ययन इन कृतियों के विवेचन
बिना अपूर्ण है।
आधुनिक साहित्य के विशिष्ट अध्येता विद्वान
प्रो. सुरेंद्र चौधरी ने महेंद्रभटनागर की कविता के प्रति जिस तुलनात्मक दृष्टि को
उजागर किया; वह विशेष रूप से द्रष्टव्य
है:
‘‘वर्त्तवाल और महेंद्रभटनागर
एक ही दशक के दो महत्त्वपूर्ण कवि हुए। इसी समय उर्दू में प्रसिद्ध प्रोग्रेसिव शायर
साहिर भी उभरे। इनका मिला-जुला अध्ययन काफ़ी रोचक रहेगा। यह लोक-व्यापी आन्दोलन, अपने समय का सबसे
गतिशील अभिव्यक्ति था।’’
खेद है, सुरेंद्र चौधरी जी के निधन के कारण,
महेंद्रभटनागर की
कविता पर जो वे लिखना चाहते थे; वह पूर्ण नहीं कर
सके। उनके विचार प्रकाश में नहीं आ सके। लेकिन वे महेंद्रभटनागर की कविता के अध्ययन
व मूल्यांकन के प्रति एक विशेष दृष्टि ज़रूर दे गये; जिस पर समुचित अन्वेषण अपेक्षित है।
महेंद्रभटनागर ने अंगरेज़ी में जो काव्य-रचना
की है (उनकी पर्याप्त कविताएँ अंगरेज़ी में अनूदित भी हैं।); उस पर भी बहुत-कुछ
लिखा गया है; जो कई ज़िल्दों में
प्रकाशित है। डा. विद्यानिवास मिश्र ने उनकी कृति ‘Forty Poems’ (प्रकाशन सन् 1968) की भूमिका में जो
लिखा वह यहाँ अविकल रूप में उद्धृत है:
"The thing which strikes foremost is the note of blazing
optimism coming out of these poems, be they songs of love, songs of future of
man or songs of the advent of a new era ushered in by the common man all over
the world. Though unfortunately I cannot share this optimism, I am deeply moved
by the vigour with which it has been projected by the poet. Mahendra Bhatnagar
is Browning, Shelley and Maykovsky welded into one, he is a visionary, he is a
comrade-in-arms and he is an architect. His ‘Man fired with faith divine moves
on’ because he is firm in his conviction that ‘one day the heart-rose shall
bloom in the midst of impediments galore.’ He seeks strength from ‘the
firmament’ which ‘has changed its colour’ and from the wind’ which is always
‘humming a tune’, from the ‘gracious mother earth’ which is blessing man with a
life - ‘long and happy’.
He sings of youth in a new vein, youth for him is not a
passing phase, it is something ‘which endures’. To him woman no more bears
‘frailty’ as her other name, she is no longer ‘a source of pleasure and
pastime’. In this emancipated woman he has found a companion. He is ‘never
alone’, ‘the resurgent age is with him’, the future is driving him on. These
are a few pieces which reflect the inner struggle between this optimism and
disillusionment, but they are subdued by the dominating voice of hope. Such a
sincere optimism is a rare quality and deserves full applause; more so, when we
have the perspective of a sad and sick man of today.
The poet has a very sensitive ear for cadences
and knows how to use them. His diction is chaste though racy, transparent and
yet colourful, his imagery drawn partly from
common-place of life and partly from poetic conventions, is simple and
effective, it is not pretentious, as the so called modern imagery is and is the
most suited instrument for the content.
I envy the impetuosity of Mahendra
Bhatnagar and at the same time I admire his patience (‘the wall won’t
collapse’) and his courage. If at times he is carried away by his creed, it
only shows his zeal and not his weakness. If at times, he looks utterly lost in
'the masses idea', it only shows his devotion to the cause and not his lack
of personality. If at times he turns a
romantic visionary, it is an indicator of his fiery youth and not of his
blindness to reality."
कहना न होगा, महेंद्रभटनागर की
कविता ने काव्य-मर्मज्ञों का ध्यान निरन्तर आकर्षित किया है।
लब्ध-प्रतिष्ठ जनवादी आलोचक डा. शिवकुमार मिश्र
ने अपना मत इन शब्दों में अंकित किया:
‘‘महेंद्रभटनागर की
कविता की, शुरूआती दौर से ही, यह विशेषता रही है
कि कविताओं में भोगे और अर्जित किये हुए अनुभव-संवेदनों को ही उन्होंने तरज़ीह दी है।
किताबी, आयातित या उधार लिया
हुआ, उसमें लगभग कुछ भी
नहीं है, न रहा है। इसी नाते
उनकी अभिव्यक्ति विश्वसनीय भी है और सहज तथा प्रकृत भी। प्रगतिशील आन्दोलन के शुरूआती
दौर में जो उफ़ान और आवेग, जो Loudness
कविता में थी, उनकी कविता में उसकी
अनुगूँजें नहीं आयीं। न तो वे पहले Loud थे और न ही आज हैं।
रचनाधर्मी प्रयोग भी उसमें नहीं हैं। वह सीधी
और सहज कविता है, फिर भी सपाट और सतही
नहीं। चूँकि वह अनुभव-प्रसूत है अतएव उसमें शिल्प के बजाय बात बोली है — सारगर्भित बात, जिसे किसी भंगिमा
की दरकार नहीं, जो अपने कथ्य और उससे
जुड़ी संवेदना के बल पर पढ़ने वाले के दिल-दिमाग़ में उतर जाती है। उसकी विशेषता उसकी
प्रशांति तथा प्रांजलता है। कुल मिलाकर,
महेंद्रभटनागर की
कविता धरती और जीवन के प्रति अकुंठ राग की कविता है। वह मानव-जिजीविषा की कविता है, जो मरना नहीं जानती।’’
जब कि डा. रवि रंजन (केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद) ने रेखांकित
किया:
महेंद्रभटनागर लगभग बीसवीं सदी के मध्य से
ही हिंदी काव्य-परिदृश्य पर अपनी रचनात्मक शक्ति एवं सीमा के साथ कमोबेश चर्चा में
रहे हैं। ... अन्तर्वस्तु की दृष्टि से महेंद्रभटनागर की कविताएँ वैविध्य पूर्ण हैं।
उनमें यथास्थिति के विरुद्ध गहरा आक्रोश मौजूद है। तटस्थता की ऐयाशी के बजाय वहाँ एक
ख़ास क़िस्म की रचनात्मक बेचैनी मिलती है,
जिसके तहत कवि अपने
समय और सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं को —
उसके दिनानुदिन तीव्रतर
होते जा रहे अन्तर्विरोधों एवं संघर्ष को वाणी देता रहा है। इस दरमयान हर कविता का
अपने परिवेश के तमाम अन्तर्विरोधों एवं संघर्षों से पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो गया
हो, यह ज़रूरी नहीं है, पर महेंद्रभटनागर
के रचना-संसार पर मुकम्मल तौर से नज़र दौड़ाने पर उनके अन्तःकरण के व्यापक आयतन का पता
चलता है, जिसे कतई भुलाया या
झुठलाया नहीं जा सकता। ... जहाँ तक उनकी काव्य-भाषा का ताल्लुक है, हम पाते हैं कि कवि
ने संस्कृत और अंगरेज़ी के तमाम आरोपित प्रभावों से मुक्त करके उसके सरल और देसी रूप
को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। दूसरे शब्दों में कहें तो बोलचाल का लहज़ा
एवं व्यवहार ही वस्तुतः उनकी कविताओं की भाषिक संरचना का एकमात्र आधार है। इसके चलते
यदि उनकी काव्य-भाषा तत्सम से तद्भव की ओर उन्मुख हुई है, तो यह स्वाभाविक ही
है। कारण यह है कि तद्भवीकरण हिंदी के मिज़ाज में है, जो इसके जनभाषा होने का सबूत भी है। सच तो यह है कि उनकी कविता
में रचना-विशेष की नैसर्गिक आकांक्षा के अनुरूप विविध भाषिक प्रयोगों के नमूने मिलते
हैं और यह एक कवि की अनुभूति की व्यापकता एवं गहराई का परिचायक है। ... समग्रतः यह
कहा सकता है कि महेंद्रभटनागर की कविता बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध की तमाम प्रगतिशील
सांस्कृतिक चिंतन सरणियों एवं कलात्मक तकनीकों का वरण करने के बावज़ूद आदि से अंत तक
कविता बनी रहती है, कोरा भावोच्छ्वास
या नारा नहीं। ... उसकी कविता में एक संवेदनशील कवि की वैचारिकता एवं विचारक की संवेदनशीलता के बीच उत्पन्न सर्जनात्मक
तनाव विद्यमान है। .. विष्णु नागर की एक काव्य-पंक्ति उधार लेकर कहें तो कवि महेंद्रभटनागर
की कविता ऐसी ‘अच्छी कविता’ है, जो न केवल ‘सबसे अच्छे दिनों
में याद आएगी’, बल्कि वह ‘सबसे बुरे दिनों में
भी पहचानी जाएगी।’
डा. देवराज (मणिपुर विश्वविद्यालय) ने महेंद्रभटनागर
की कविता के मर्म को समझा है और उनकी विचार-धारा का सही विश्लेषण किया है:
‘‘प्रगतिवादी-जनवादी
कविता के यशस्वी हस्ताक्षर हैं —
महेंद्रभटनागर। उनका
काव्य-रचना-कर्म सन् 1941 से प्रारम्भ हुआ; जो अनवरत रूप से गतिमान
है। महेंद्रभटनागर ने कम लिखा;
किन्तु जितना लिखा
विशिष्ट व उत्कृष्ट लिखा। परिमाण में उनकी कविताएँ लगभग एक-हज़ार होंगी; जो उनके बीस काव्य-संकलनों
में समाविष्ट हैं।
महेंद्रभटनागर की विचारधारा वाम है; किन्तु वह आरोपित
नहीं। वह जीवन-अनुभवों की उपज है। समाजार्थिक यथार्थ उनका प्रमुख सरोकार है; किन्तु व्यक्ति-यथार्थ
की अभिव्यक्ति भी उन्होंने निःसंकोच की है;
जिसमें उल्लास है
तो दर्द भी। गहन वेदना के नीले तन्तु से उनके काव्य के आवेष्टित होने के फलस्वरूप उन्हें
‘जीवन-त्रासदी का कवि’ भी घोषित किया गया है।
महेंद्रभटनागर व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल
पक्षधर हैं। नये इंसान की अवतारणा के लिए सतत प्रयत्नरत। उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों की
प्रतिष्ठा के लिए प्रतिबद्ध। यही कारण है,
गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और
विवेकानन्द के वैयक्तिक आचरण से वे अत्यधिक प्रभावित हैं। स्वतंत्र चिन्तन उन्हें किसी
‘वाद’ में बँधने नहीं देता।
महेंद्र जी की काव्य-कला-सौष्ठव संबंधी विशेषताएँ
हैं: प्रसन्न-प्रांजल अभिव्यक्ति,
सहज भाषा-प्रवाह, अभिनव मात्रिक छंदों
व प्रचलित चिर-पहचानी तुकों (आन्तरिक भी) से सज्ज, लय व संगीति धर्मी प्रभावी गूँजों-अनुगूँजों से परिपूर्ण।’’
द्वि-भाषिक
कवि ( हिन्दी और अंग्रेज़ी) महेंद्रभटनागर की काव्य-विशेषताएँ सूत्र रूप में प्रस्तुत
हैं:
‘‘सन् 1941 के लगभग अंत से काव्य-रचना
आरम्भ। तब कवि (पन्द्रह-वर्षीय ) ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में इंटरमीडिएट (प्रथम
वर्ष) का छात्र था। सम्भवतः प्रथम कविता ‘सुख-दुख’ है; जो वार्षिक पत्रिका
‘विक्टोरिया कॉलेज
मेगज़ीन’ के किसी अंक में छपी
थी। वस्तुतः प्रथम प्रकाशित कविता ‘हुंकार’ है; जो ‘विशाल भारत’ (कलकत्ता) के मार्च
1944 के अंक में प्रकाशित
हुई।
लगभग छह-वर्ष की काव्य-रचना का परिप्रेक्ष्य स्वतंत्राता-पूर्व भारत; शेष स्वातंत्रयोत्तर।
हिन्दी की तत्कालीन तीनों काव्य-धाराओं से सम्पृक्त — राष्ट्रीय काव्य-धारा, उत्तर छायावादी गीति-काव्य, प्रगतिवादी कविता।
समाजार्थिक-राजनीतिक-राष्ट्रीय चेतना-सम्पन्न रचनाकार।
सन् 1946 से प्रगतिवादी काव्यान्दोलन
से सक्रिय रूप से सम्बद्ध । ‘हंस’ (बनारस / इलाहाबाद)
में कविताओं का प्रकाशन। तदुपरांत अन्य जनवादी-वाम पत्रिकाओं में भी। प्रगतिशील हिन्दी
कविता के द्वितीय उत्थान के चर्चित हस्ताक्षर।
सन् 1949 से काव्य-कृतियों
का क्रमशः प्रकाशन।
प्रगतिशील मानवतावादी कवि के रूप में प्रतिष्ठित।
समाजार्थिक यथार्थ के अतिरिक्त अन्य प्रमुख काव्य-विषय –— प्रेम, प्रकृति, जीवन-दर्शन।
दर्द की गहन अनुभूतियों के समान्तर जीवन और जगत के प्रति आस्थावान कवि। अदम्य
जिजीविषा एवं आशा-विश्वास के अद्भुत-अकम्प स्वरों के सर्जक।
काव्य-शिल्प के प्रति विशेष रूप से जागरूक।
छंदबद्ध और मुक्त-छंद दोनों में काव्य-सृष्टि। छंद-मुक्त गद्यात्मक कविता
अत्यल्प। मुक्त-छंद की रचनाएँ भी मात्रिक छंदों से अनुशासित।
काव्य-भाषा में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त तद्भव व देशज शब्दों एवं अरबी-फ़ारसी
(उर्दू), अंग्रेज़ी आदि के प्रचलित
शब्दों का प्रचुर प्रयोग।
सर्वत्र प्रांजल अभिव्यक्ति। लक्षणा-व्यंजना भी दुरूह नहीं। सहज काव्य के
पुरस्कर्ता। सीमित प्रसंग-गर्भत्व।
विचारों-भावों को प्रधानता।
कविता की अन्तर्वस्तु के प्रति सजग।’’
महेंद्रभटनागर-विरचित समाजार्थिक यथार्थ की कविताओं से उनके सामाजिक-राजनीतिक
सरोकारों को समझा जा सकता है। आशा है,
सुधी समीक्षक महेंद्रभटनागर
की कविता का मूल्यांकन कवि-विकास और ऐतिहासिक
परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर करेंगे।
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रीडर : हिंदी-विभाग,
डॉ. शकुन्तला मिश्रा पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ (उ. प्र.)
फ़ोन : 94 159 24 888
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