बुधवार, 17 मार्च 2010
जनपक्ष: शलाका को तमाचे के लिये आभार!
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
सर आपका घर गच्ची वाला है ?
देवास की एक बस्ती में करीब 34 लड़कियां हैं जो नियमित रूप से हमारे पास पढ़ने आती हैं। इन बच्चियों में मूल रूप से मुस्लिम और दलित किषोरियां हैं। उन्हें पता नहीं - कि क्यों पढ़ती हैं, बातचीत में पता चला कि उन्हें पढ़ने और स्कूल जाने के बराबर अवसर नहीं मिले और ना ही कभी वे स्कूल की फेंटेसी को जी पाई हैं। जब मैं रोज़ की तरह सेंटर पहुंचा तो बच्चों का हुजुम हमारे पिछे आ रहा था, करीब दो घंटा पढ़ाई के बाद, बात करते-करते एक बच्ची (मुस्कान 8 वर्ष) ने पूछा कि आप कहां रहते हो ? जवाहर नगर में, मैने कहा। उसने फिर पूछा सर आपका घर गच्ची वाला है ? पहले तो मुझे सवाल समझ नहीं आया कि गच्ची वाला का क्या मतलब है ? तो एक साथी ने बताया कि गच्ची वाला याने छत वाला घर। मैने जब मुस्कान से हां कहा तो उसने कहा - सर आप मुझे एक बार वहां ले चलोगे ? इस सवंाद से मुझे पहली बार एहसास हुआ कि घरों की पक्की दिवारों और छतों के भी अपने मायने होते हैं और वे किसी फेंटेसी से कम नहीं होते। इससे पहले शायद ही मैने कभी अपने घर की छत को देखा हो ?
सौरभ वर्मा
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
kalki avtar aur main
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पिछले दिनों कोई व्यक्ति मेरे नाम और पते का इस्तेमाल प्रेषक के रूप में करते हुए कल्कि अवतार सम्बन्धी आठ - दस पृष्ठ की प्रचारात्मक सामग्री देश में अनेक व्यक्तियों को डाक से प्रेषित कर रहा है. मैं एक प्रगतिशील विचार धारा का कवि हूँ , इस तरह की गतिविधियों से मेरा दूर तक कोई लेना देना नहीं है. अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में मेरी कवितायेँ प्रकाशित होती रहती है . मुझे लगता है कि किसी साहित्यिक पत्रिका से मेरा नाम और पता ले कर तथा इन्ही पत्रिकाओं से अन्य लोगों के नाम पते लेकर अनेक साहित्यकारों को भी ये सामग्री प्रेषित कि जा रही है. मेरे पास उज्जैन से सुप्रसिद्ध कवि श्री चंद्रकांत देवताले जी का मोबाइल आया , उन्हें भी मेरे नाम से ऐसी ही सामग्री मिली है. जयपुर में राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष डा. हेतु भारद्वाज एवं युवा कहानीकार अरुण कुमार असफल को भी ऐसी सामग्री मिली है. इसमें समानता ये है कि भोपाल से प्रकाशित प्रगतिशील वसुधा के ताज़ा अंक में हम चारों की रचना प्रकाशित है. कुछ पत्र मेरे पास प्रेषक पर मेरा नाम होने के कारण लौट कर भी आये है, यधपि इन पर डाक घर की मोहर स्पष्ट नहीं है, फिर भी मेरा अनुमान है कि ये पत्र मध्य प्रदेश के किसी डाक घर से पोस्ट किये गए है. ऐसे पत्रों के कारण मेरी छवि तो धूमिल हो ही रही है , मुझे मानसिक संताप भी हो रहा है. जिन किसी भी परिचित - अपरिचित व्यक्तियों के पास ऐसी सामग्री मेरे नाम से पहुंची है , उनसे निवेदन है कि ये किसी धार्मिक- अंध विश्वासी व्यक्ति या समूह का काम है. मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है. मैं आप सभी से ये भी जानना चाहता हूँ कि क्या इस सम्बन्ध कोई कानूनी कार्यवाही कि जा सकती है ? कृपया मुझे निर्देशित करे.
गोविन्द माथुर
अध्यक्ष, प्रगतिशील लेखक संघ
जयपुर इकाई
रविवार, 27 दिसंबर 2009
युवा दखल: साहित्यकार की जगह सडक नहीं होती

सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने मंहगाई को राष्ट्रीय आपदा घोषित किये जाने, शिक्षा, रोटी और रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाये जाने तथा नयी आर्थिक नीति वापस लेने की मांग की। एटक के राजेश शर्मा, कैलाश कोटिया, युवा संवाद के अजय गुलाटी, स्त्री अधिकार संगठन कि किरण, सीटू के श्याम कुशवाह, इण्डियन लायर्स एसोशियेशन के गुरुदत्त शर्मा तथा यतींद्र पाण्डेय, ग्वालियर यूनाईटेड काउंसिल आफ़ ट्रेड यूनियन्स के एम के जायसवाल, एम पी मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव यूनियन के राजीव श्रीवास्तव, आयुष मेडिकल एसोसियेशन के डा अशोक शर्मा, डा एम पी राजपूत, जन संघर्ष मोर्चे के अभयराज सिंह भदोरिया, नगर निगम कर्मचारी यूनियन के अशोक ख़ान, प्रलेसं के भगवान सिंह निरंजन सहित तमाम वक्ताओं ने इस संयुक्त मोर्चे को वक़्त की ज़रूरत बताते हुए संघर्ष की लौं तेज़ करने का संकल्प किया। संचालन युवा कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने किया।
लेकिन जहां एक तरफ इन तबकों ने अपनी व्यापक एकता का परिचय दिया, शहर के मूर्धन्य काग़ज़ी शेर उर्फ़ साहित्यकार इससे दूर ही रहे। एक साहब को जब हमने फोन लगाया तो उत्तर मिला-- ''अरे भाई यह हमारा काम नहीं है। साहित्यकार की जगह सडक नहीं होती।'' आप को क्या लगता है?
रविवार, 6 दिसंबर 2009
सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ साझा अभियान
धार्मिक कट्टरपंथ तथा आतंकवाद एक दूसरे के पूरक हैं। छः दिसंबर भारतीय संविधान तथा साम्प्रदायिक सद्भाव पर आधारित हमारी परम्परा के चेहरे पर बदनुमा दाग़ है। आर एस एस और उसके आनुसांगिक संगठनो ने सत्ता के लोभ में देश के भीतर जो धार्मिक उन्माद पैदा कर लोगों के बीच साम्प्रदायिक विभाजन किया वही आज आतंकवाद के मूल में है। मनमोहन सिंह कहते हैं की माओवाद देश के सम्मुख सबसे बड़ा खतरा है पर वास्तविकता यह है कि हमारे सम्मुख सबसे बड़ा खतरा धार्मिक कट्टरपंथ है। यह बातें आज युवा संवाद की पहलकदमी पर दिसंबर को आयोजित साम्प्रदायिकता और आतंकवाद विरोधी दिवस पर अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए डा मधुमास खरे ने कही।
उल्लेखनीय है कि युवा संवाद, संवाद, स्त्री अधिकार संगठन , प्रगतिशील लेखक संघ, आल इंडिया लायर्स एसोशियेशन, जनवादी लेखक संघ, बीमा कर्मचारी यूनियन, गुक्टू, इप्टा सहित शहर के तमाम जनसंगठनों ने छः दिसंबर को सांप्रदायिकता और आतंकवाद विरोधी दिवस के रूप मे मनाते हुए फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा पर संयुक्त बैठक आयोजित की।
बैठक में इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने भारत तथा दुनिया भर में बढते आतंकवाद पर चिंता जताते हुए कहा कि इसके मूल में आर्थिक विषमतायें ही प्रमुख हैं। अजय गुलाटी ने विषय की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि आज अंबेडकर की पुण्यतिथि है और उन्होंने बहुत पहले धर्म के अमानवीय स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा था कि अगर कभी हिन्दु राष्ट्र बना तो वह दलितों और महिलाओं के लिये विनाशकारी होगा। अशोक पाण्डेय ने कहा कि इस धार्मिक राजनीति के केन्द्र में न मनुष्य है न इश्वर बस सत्ता है। आज़ादी के पहले मुस्लिम लीग और आर एस एस दोनों अंग्रेज़ों की सहयोगी थीं और बाद में देशभक्त हो गयीं। डा प्रवीण नीखरा ने शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन पर ज़ोर दिया तो ज्योति कुमारी तथा किरन ने धर्म के महिला विरोधी स्वरूप पर ध्यान खींचते हुए कहा कि हर दंगा स्त्री के शरीर पर हमले से शुरु होता है।
डा पारितोष मालवीय, अशोक चौहान, जितेंद्र बिसारिया, पवन करण, राजवीर राठौर, ज़हीर कुरेशी, फ़िरोज़ ख़ान सहित अनेक लोगों ने बहस में हिस्सेदारी की। अंत में पास एक साझा प्रस्ताव में साम्प्रदायिकता विरोधी ताक़तों को मज़बूत करने तथा शीघ्र मंहगाई पर जनजागरण के लिये एक अभियान चलाने पर सहमति बनी।

