शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

युवा दखल: साहित्य का आधिक्य और पुरस्कारों की लालीपाप



पिछले दिनों अन्यान्य कारणों से पुरस्कार और उनसे जुड़े तमाम विवाद बहसों के केन्द्र में रहे। वैसे भी इस साहित्य विरोधी माहौल में जब साहित्य कहीं से जीवन के केन्द्र में नही है, बहसों के मूल में अक्सर साहित्य की जगह कुछ चुनिन्दा व्यक्ति, पुरस्कार और संस्थायें ही रहे हैं। पाठकों के निरंतर विलोपन और इस कारण साहित्य के स्पेस के नियमित संकुचन ने वह स्थिति पैदा की है जिसमे व्यक्तियों के प्रमाणपत्र निरंतर महत्वपूर्ण होते गए हैं। ऐसे में यह अस्वाभाविक नही कि पूरा साहित्य उत्तरोत्तर आलोचक केंद्रित होता चला गया और पुरस्कार तथा सम्मान रचना का अन्तिम प्राप्य।

यहाँ यह भी देखना ज़रूरी होगा कि हिन्दी में लेखन का अर्थ ही साहित्य रचना होकर रह गया। अगर कोई कहे के वह हिन्दी का बुद्धिजीवी है तो सीधे-सीधे मान लिया जाता है कि वह या तो कवि है, या आलोचक या उपन्यासकार या फिर यह सबकुछ एकसाथ। हिन्दी का पूरा बौद्धिक परिवेश साहित्य लेखन के इर्दगिर्द सिमटा रहा है और इतिहास, दर्शन, अर्थशाष्त्र, राजनीति आदि पर अव्वल तो गंभीर बात हुई ही नहीं और अगर कुछ लोगों ने की भी तो आत्मतुष्ट साहित्य बिरादरी ने उसे हमेशा उपेक्षित ही रखा। इसका पहला अनुभव मुझे समयांतर के दस साल पूरे होने पर पंकज बिष्ट जी द्वारा आयोजित प्रीतिभोज में हुआ जहां केन्द्र में रखी विशाल मेज़ पर साहित्य के बडे नामों और नये पुराने संपादकों का कब्ज़ा था और सामाजार्थिक विषयों पर वर्षों से पत्रिका में नियमित लिखने वाले तमाम वरिष्ठ लोग परिधि पर स्थित कुर्सियों में सिमटे थे। इनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें अपने-अपने विषयों के बौद्धिक जगत में अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। यह एक ऐसी की पत्रिका के कार्यक्रम का दृश्य था जो मूलतः साहित्य की पत्रिका नहीं है। यह हिन्दी के बौद्धिक परिवेश का एक स्पष्ट रूपक है।

इसका परिणाम यह है कि अन्यान्य विषयों में हिन्दी का बौद्धिक परिवेश अत्यंत एकांग़ी और लचर रहा है। परीकथा के पिछले अंक में गिरीश मिश्र का प्रो अब्दुल बिस्मिल्लाह को दिया जवाब इस पूरे परिदृश्य को बडी बेबाकी से परिभाषित करता है। यह आश्चर्यजनक तो है ही कि पूरा हिन्दी जगत बाज़ारीकरण जैसी भ्रामक और निरर्थक शब्दावली का प्रयोग करता है, नवउदारवाद और नवउपनिवेशवाद जैसे शब्दों का प्रयोग समानार्थी रूप में प्रयोग किया जाता है और भी न जाने क्या-क्या।
यही नहीं, अन्य विषयों की उपेक्षा का ही परिणाम है कि हिन्दी में सारे पुरस्कार बस साहित्य के लिये आरक्षित हैं। पत्रकारिता को छोड दें तो हिन्दी की लघु पत्रिकाओं में अन्य विषयों पर लिखने वालों के लिये न तो कोई प्रोत्साहन है न पुरस्कार। तमाम चर्चाओं, परिचर्चाओं और कुचर्चाओं के क्रम में साहित्येतर विषय सिरे से गायब रहते हैं।
यह किस बात का द्योतक है? साहित्य की सर्वश्रेष्ठता का या हिन्दी के बौद्धिक दारिद्र्य का?

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

बीकानेर में उदास हैं रिक्शे, तांगे, ठेले वाले...


जन कवि हरीश भादाणी का 2 अक्‍टूबर, 2009 को निधन हो गया। मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

हरीश भादाणी जनकवि थे, यह तो सभी जानते हैं। क्या दूसरा भी कोई जनकवि है? शायद होगा, लेकिन मुझे नहीं पता। मैंने तो अपने जीवन में एक ही जनकवि देखा है-हरीश भादाणी। जो ठेलों पर खड़े होकर मजदूरों के लिए हाथों से ललकारते हुए गाते थे- बोल मजूरा, हल्ला बोल...।
भादाणी जी से मेरे लगभग तीस-पैंतीस साल पुराने आत्मीय रिश्ते रहे हैं। उनकी यादों के इतने बक्से हैं कि उन्हें तरतीबवार खोल भी नहीं सकता। बात 1980 की है। वे अलवर आए, तब हम ‘पलाश’ नाम की एक साहित्यिक संस्था चलाते थे। हम उनका काव्य पाठ रखना चाहते थे, लेकिन अगले दिन दोपहर को उनको जाना था। हमारी अब तक धारणा यही रही है कि काव्य पाठ और गजलों के कार्यक्रम शाम को ही होते हैं। हमने इस धारणा को तोड़ा। सुबह नौ बजे सूचना केन्द्र में उनका काव्य पाठ रखा और कार्यक्रम को नाम दिया-‘कविता की सुबह।‘ आश्चर्य तब हुआ जब सुबह-सुबह लोग बड़ी संख्या में उन्हें सुनने आ गए। तब लगा, सचमुच भादाणी जी जनकवि हैं। सर्दियों की वह गुनगुनी सुबह कविताओं से महक उठी।
एक अद्भुत घटना मैं जीवन में कभी नहीं भूलता। बात लगभग 25 साल पुरानी है। मैं अपनी बहन के शिक्षा विभाग संबंधी एक कार्य को लेकर पहली बार बीकानेर गया। ट्रेन से उतरते ही स्टेशन के बाहर जो होटल सबसे पहले नजर आई, उसमें ठहर गया। कमरे में सामान रख कर नीचे आया तो पास में चाय के एक ढाबे पर भादाणी जी कुछ मित्रों के साथ ठहाके लगा रहे थे। मुझे देखा तो पहचान गए। बोले-‘यहां क्यों ठहरे हो, सामान उठाओ और घर चलो।‘ मैं संकोचवश उन्हें मना करता रहा। उन्होंने ज्यादा जिद की तो मैंने कहा कि अभी मैंने होटल वाले को एडवांस पैसे दे दिए हैं, कल सुबह घर आ जाऊंगा। अपना पता समझा दें। वे बोले, ‘किसी भी रिक्शे, तांगे वाले को बोल देना, वह घर पहुंचा देगा।‘
अगले दिन सुबह मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब सडक़ चलते एक तांगे वाले को रोक कर मैंने भादाणी जी के घर चलने को कहा तो वह उत्साह से भर उठा और होटल से मेरा सामान तक खुद उठा कर लाया। घर पहुंच कर मेरे जिद करने के बावजूद उसने किराये का एक पैसा भी नहीं लिया। तब मेरी पहली बार आंखें खुलीं, जनकवि इसे कहते हैं। ऐसा कवि ही लिख सकता है, ‘रोटी नाम सत है, खाए से मुगत है, थाली में परोस ले, हां थाली में परोस ले, दाताजी के हाथ मरोड़ कर परोस ले।‘
मैं भादाणी जी के घर दो-तीन दिन रुका। उनका वह स्नेह और आत्मीय मेजबानी मैं जीवन में कभी नहीं भूल सकता। भादाणी जी ने एक बार एक दिलचस्प किस्सा सुनाया। उनका एक गीत है, ‘मैंने नहीं, कल ने बुलाया है... आदमी-आदमी में दीवार है, तुम्हें छेनियां लेकर बुलाया है, मैंने नहीं, कल ने बुलाया है।‘ भादाणी जी एक मित्र के घर गए तो इस गीत के बारे में उनकी बच्ची ने कहा, ‘दद्दू, आपकी एक कविता हमारी पाठ्यपुस्तक में है।‘ उन्होंने पूछा, ‘मास्टर जी ने कैसी पढ़ाई।‘ बच्ची बोली, ‘बहुत अच्छी पढ़ाई। उन्होंने पढ़ाया कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को मिलने के लिए बुला रहा है।‘ मुझे और मेरे जैसे कई मित्रों को लगता है कि भादाणी जी के गीत और कविताओं के साथ शिक्षकों ने ही अन्याय नहीं किया है, बड़े शिक्षकनुमा आलोचकों ने भी अन्याय किया है। बड़े आलोचक जिसे चाहें, उसे उठा कर आसमान पर बिठा देते हैं, लेकिन वे हरीश भादाणी के आसमान को छू तक नहीं पाए। भादाणी जी की रचनाओं का मॉडल कहीं दूसरा देखने को नहीं मिलता। उनकी अपनी विशिष्ट शैली थी। वे अपने किस्म के कवि थे। अपने ढंग से जिए और अपने ढंग से चले गए। मेडिकल कॉलेज को देह दान कर गए ताकि उनकी देह भी जनता के काम आए। वे ऐसे जन थे, ऐसे जनकवि थे। मैंने कोई दूसरा जनकवि नहीं देखा। बीकानेर में आज जरूर रिक्शे, तांगे और ठेले वाले भी उदास होंगे और अपने कवि के लिए आंसू बहा रहे होंगे।

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

इस ख़तरनाक समय में



ज्ञानरंजन के इस्तीफे और अन्य विवादों को लेकर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव का प्रो. कमला प्रसाद का बयान


भोपाल 23 सितंबर, 2009 विगत कुछ दिनों प्रकाशित पत्रिकाओं-समाचार पत्रों के कुछ लेखों तथा हमारे सम्मानित लेखक ज्ञानरंजन की टिप्पणियों ने प्रलेस से संबंधित सांगठनिक स्तर पर कुछ सवाल पैदा किए हैं। प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी बनती है कि उठाए गए सवालों के बारे में वस्तुस्थिति स्पष्ट करूं। सवाल हैं कि प्रमोद वर्मा संस्था्न द्वारा आयोजित ‘प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह’ में प्रलेस की भागीदारी क्यों हुई? प्रगतिशील वसुधा ने गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से फोर्ड फाउण्डे्शन की राशि से प्रदत्त कबीर चेतना पुरस्कार चुपके-चुपके क्यों ले लिया?

पहले प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह के बारे में बातें करें। इस आयोजन में जलेस-प्रलेस और जसम के अलावा अन्य महत्वपूर्ण लेखकों को आमंत्रित किया गया था। संस्थान की ओर से भेजे गए पहले निमंत्रण पत्र में वे नाम थे जिन्हें आमंत्रण भेजा गया था। दूसरे और आखिरी निमंत्रण पत्र में वे नाम थे जिन्होंने आने की स्वीकृति दी थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि जिनकी स्वीकृति नहीं मिली उन्हें छोड़ दिया गया। जहां तक प्रमोद वर्मा का सवाल है, वे मार्क्सवादी और मुक्तिबोध, परसाई के साथी थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मण्डल में रहे हैं। छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही, इसलिए बहुत से लेखकों से उनके वैचारिक पारिवारिक रिश्ते थे। विश्वरंजन तब उसी क्षेत्र में पदस्थ होने के कारण प्रमोद जी की मित्र मण्ड्ली में थे। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान बना-तो उसमें रूचि से वे सहयोगी बने। छत्तीसगढ़ के अनेक लेखकों के साथ आजकल वे इसके अध्यक्ष हैं। निर्णय का अधिकार अकेले उन्हें ही नहीं है। पृष्ठभूमि के रूप में इसे जानना जरूरी है। इस कार्यक्रम की घोषणा हुई तो मैंने छत्तीसगढ़ प्रलेस के साथियों से पूछा कि क्या स्थिति है? छत्तीसगढ़ के साथियों ने सलाह दी कि प्रमोद वर्मा पर कार्यक्रम प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से है। सरकारी अनुदान नहीं है, इसलिए आना चाहिए। स्वीकृति देने वाले लेखकों में मैंने अनेक वैचारिक साथियों और संगठनों में शामिल लेखकों के नाम देखे तो जाना तय किया। समारोह में आने वालों में छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण लेखकों के अलावा खगेंद्र ठाकुर, अशोक वाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, शिवकुमार मिश्र, कृष्ण मोहन, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे नाम थे। कृष्ण मोहन और श्री भगवान सिंह को आलोचना पुरस्कार भी दिया गया था। अच्छी बात यह हुई कि प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन हुआ।

कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री और कुछ नेताओं के आने तथा विवादास्पद वक्तव्य देने पर वहां आए लेखकों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई, और इनका आक्रामक उत्तर लोगों ने अपने-अपने वक्तव्यों में दिया। पूरे आयोजन में प्रमोद वर्मा की विचारधारा ‘मार्क्सवाद’ बहस का आधार बनी रही। इसी दौरान कहीं से चर्चा में सुनाई पड़ा कि एक मित्र लेखक ने ‘पब्लिक एजेण्डा' में विश्वरंजन अर्थात डी.जी.पी.छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के समर्थन और नक्सलपंथियों के विरोध में छपे इंटरव्यू को मुद्दा बनाकर कार्यक्रम में शामिल होना स्थगित किया है। उस समय तक लोगों ने ‘पब्लिक एजेण्डा’ का इंटरव्यू नहीं देखा था। इसके अलावा, सीधे भाजपा शासित सरकारी कार्यक्रम न होने के कारण लोग इसमें आए थे। उन्हें पहले से पता था कि सलवा जुडुम भाजपा सरकार के एजेण्डे में है। आमंत्रित लेखकों ने प्रमोद वर्मा स्मृति के पूरे आयोजन को लेकर कुछ आपत्तियां दर्ज कराईं। संस्थान के साथियों को परामर्श दिया गया कि इसे हमेशा सत्ता के प्रमाण से अलग रखा जाए।

छत्तीसगढ़ के जलेस-प्रलेस के साथियों तथा वामपंथी राजनीतिक दलों ने लगातार सलवा जुडुम के मसले पर सरकार का विरोध किया है। डॉ. विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई के लिए हुए आंदोलन में ये सभी लेखक शामिल रहे हैं। लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में यह प्रमुख मुद्दा था। याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं। मध्य‍प्रदेश में पिछले छह वर्षों में अल्पसंख्यकों पर सैंकड़ों अत्याचार और हत्याएं हुईं हैं। प्रलेस के लेखकों ने यहां लगातार सरकारी कार्यक्रमों का समय-समय पर विरोध और यथासमय बहिष्कार किया है। एक सूची प्रकाशित की जानी चाहिए कि मध्यप्रदेश में और इन सारे प्रदेशों के सरकारी कार्यक्रमों में किनकी-किनकी कहां-कहां भागीदारी रही है। मैं नहीं मानता कि गैर सरकारी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शामिल होने मात्र से लेखकों का हत्यारों के पक्ष में खड़ा होना कहा जाएगा।

साथियों की ओर से उठाया गया अन्य सवाल वसुधा के फोर्ड फाउण्डेशन की राशि से कबीर चेतना पुरस्कार लेने का है। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि संस्था़न से स्पष्ट जानकारी के बाद कि यह पुरस्कांर राशि संस्थान की ओर से है फोर्ड फाउण्डेशन की ओर से नहीं, संपादकों ने चुपके-चुपके नहीं, एक समारोह में यह पुरस्कार प्राप्त किया है। लोग जानते हैं कि गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद केंद्रीय विश्वंविद्यालय का एक प्रभाग है। दलित संसाधन केंद्र उसकी एक इकाई है। दलित संसाधन केंद्र की ओर से विगत कई वर्षों से दलितों की स्थितियों पर अध्ययन होता रहा है। संस्थान द्वारा दलितों के बारे में दस्तावेजीकरण के अलावा इलाहाबाद तथा भोपाल जैसे अन्य शहरों में केंद्र की संगोष्ठियां हुईं हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि हिंदी का कौन-सा महत्वपूर्ण लेखक है जो इन कार्यक्रमों में नहीं गया और मानदेय स्वीकार नहीं किया। जहां तक कबीर चेतना पुरस्कार की बात है, पहले हंस और तद्भव ने ये पुरस्कार लिए हैं। इनके संपादक भी संगठनों के हिस्से हैं। प्रगतिशील वसुधा लगातार दलित साहित्य प्रकाशित करती रही है। एक विशेषांक भी प्रकाशित हुआ था, इसलिए निर्णायकों ने इस पत्रिका की पात्रता तय की है। प्रलेस से सीधी जुड़ी होने के कारण प्रगतिशील वसुधा का ऑडिटेड आय-व्यय खुले पन्नों में है। कभी भी देखा जा सकता है।

दोनों सवालों का तथ्यात्मक ब्यौरा पेश करने के बाद मेरा कहना है कि आज की परिस्थितियों में जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियों का जाल देश में फैल रहा है, समूची मानवीय संस्कृति का बाज़ारीकरण हो रहा है, मूल्यों को तहस-नहस करने की साजिश है, उस समय अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अति-शुद्ध सिद्ध करने की कोशिश सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खण्डित करेगी। मर्यादाएं टूटने के बाद आंदोलन छूट जाएगा और लोग व्यक्तिगत हमलों पर उतर आएंगे। माना कि अब लेखकों के संगठन प्रेमचंद कालीन नहीं हैं, हो भी नहीं सकते। पर आज की परिस्थितियों में जो संभव है, हो रहा है। जरूरत पड़ने पर इनका जुझारू रूप देखा जा सकता है। इनके बिना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर आवश्‍यक सामूहिक पहल की कल्पना असंभव होगी। विरोधी शक्तियां इन्हें तोड़ना चाहती हैं। कदाचित इनके विघटन की प्रक्रिया शुरू हो गई तो वह दिन खतरनाक होगा।

रविवार, 9 अगस्त 2009

भिलाई में प्रेमचन्द जयंती का आयोजन


प्रगतिशील लेखक संघ दुर्ग-भिलाई के वरिष्ठ कवियों और लेखको की उपस्थिति में बी.एस.पी. उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सेक्टर 8 भिलाई में 31 जुलाई 2009 को प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर प्रेमचन्द की कहानी "पूस की रात " पर चर्चा रखी गई .प्राचार्य बी.आर.देशलहरा ने आमंत्रित साहित्यकारों का स्वागत करते हुए प्रेमचन्द के साहित्य के महत्व पर प्रकाश डाला तथा छात्रा वीणा ने प्रेमचन्द का जीवन परिचय प्रस्तुत किया . छात्र शशांक ने कहानी "पूस की रात " का पाठ किया .वरिष्ठ कवि रवि श्रीवास्तव ने शाला की साहित्य परिषद का उद्घाटन करते हुए कहा कि पूस की रात में भारतीय किसानों की जिस स्थिति का वर्णन किया गया है वह आज भी यथावत है .कवि एवं समालोचक तथा सन्यंत्र के राजभाषा प्रमुख अशोक सिंघई ने कहा कि प्रेमचन्द अपनी कहानी में मानवीय सम्वेदना और सहज सम्प्रेषण के लिये याद किये जायेंगे .प्रलेस के अध्यक्ष तथा कथाकार लोकबाबू ने कहा कि पूस की रात भारतीय किसान की किसानी छूटने तथा उसके मज़दूर बनने कि नियति कथा है . हिन्दी के प्रमुख युवा कवि शरद कोकास ने 'वागर्थ' में प्रकाशित प्रेमचन्द की आत्मकथा से उनके शालेय जीवन का विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रेमचन्द की कथाओं मे आम आदमी ही नायक है .युवा शायर मुमताज़ ने कहा कि यह अच्छी बात है कि प्रेमचन्द की परम्परा में आज भी लेखन हो रहा है किंतु वह अपनी गरिष्ठता या कलात्मकता के मोहजाल मे असम्प्रेषणीय हो गया है.परिचर्चा के उपरांत श्रीमती संतोष झांजी,अशोक सिंघई,शरद कोकास. सचिव परमेश्वर वैषणव,विमल कुमार झा तथा मुमताज द्वारा काव्य-पाठ किया गया.शाला के वरिष्ठ व्याख्याता एल.डी.जोशी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया ।

प्रस्तुति-शरद कोकास ,दुर्ग

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

दो दिवसीय प्रेमचंद जयंती समारोह जयपुर में


जवाहर कला केन्द्र एवं राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के संयुक्त तत्वावधान में ३१ जुलाई और १ अगस्त, २००९ को दो दिवसीय प्रेमचंद जयंती समारोह आयोजित किया जा रहा है। इसमें प्रसिद्द कवि नरेश सक्सेना मुख्य अतिथि होंगे। विशिष्‍ट अतिथि के रूप में उर्दू के मशहूर शायर-आलोचक शीन. काफ़. निजाम और प्रसिद्ध कवि अनिल जनविजय, संपादक कविताकोश शिरकत करेंगे। जवाहर कला केंद्र के कृष्‍णायन सभागार में 31 जुलाई को सायं चार बजे उद्घाटन सत्र में प्रेमचंद के विविध आयाम विषयक संगोष्‍ठी होगी। इस सत्र की अध्‍यक्षता उर्दू के प्रखर आलोचक डॉ. मुदब्बिर अली जैदी करेंगे। इसके बाद रंगायन सभागार में प्रेमचंद की दो कहानियों का मंचन होगा। बड़े भाई साहब का निर्देशन युवा रंगकर्मी संदीप लेले करेंगे और कफन का निर्देशन वरिष्‍ठ रंगकर्मी मुकेश चतुर्वेदी, सवाई माधोपुर करेंगे।
1 अगस्‍त, 2009 को सायं चार बजे अतिथि कवि नरेश सक्‍सेना और अनिल जनविजय का कविता पाठ होगा। इस अवसर पर वरिष्‍ठ कवि ऋतुराज और डॉ. नंदकिशोर आचार्य भी उपस्थित रहेंगे। इसके बाद मुंशी प्रेमचंद की दो कहानियों का जयपुर के प्रसिद्ध रंगकर्मी ज़फर खान और वरिष्‍ठ अभिनेत्री किरण राठौड़ साभिनय पाठ करेंगे।
इस आयोजन में आप सब मित्रों सहित सादर आमंत्रित हैं।

रविवार, 5 जुलाई 2009

रचनाकार परम्परा को सहज कर उसमें कुछ नया जोड़ें: नन्द भारद्वाज




राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ, जयपुर इकाई के तत्वावधान में रविवार 28 जून, 2009 की शाम राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर के सभागार में श्रीमती राज गुप्ता की ‘प्रखर हुआ जब मौन’ और श्रीमती रेणु जुनेजा की ‘अन्तर्मन के वातायन’ काव्य कृतियों पर चर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
हिन्दी एवं राजस्थानी के समर्थ कवि नन्द भारद्वाज ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि रचनाकार समाज की समृद्ध परम्परा को सहेजकर उसमें अपना कुछ नया जोडे़। उन्होंने आज की ज्वलंत चुनौतियों को गहराई से समझने और उसके समाधान के लिए सघन भावाभिव्‍यक्ति को माध्यम बनाने पर जोर दिया। भारद्वाज का मानना था कि दोनों कवयित्रियां भिन्नता रखते हुए भी काव्य प्रकृति, मन की संवेदना और बुनावट के स्तर पर एक-दूसरे की पूरक जान पड़ती हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति और मनुष्य के बीच अदृश्य रिश्ते को बेहतर ढंग से समझकर उसे वृहत्तर उद्देश्यों से जोड़ते हुए विस्तार देना कवि का महत्वपूर्ण कर्म है। दोनों कवयित्रियां इस दृष्टि से सही जमीन पर खड़ी हुई हैं जो एक शुभ संकेत है। नंद भारद्वाज ने रेणु जुनेजा के संग्रह का लोकार्पण भी किया।
इससे पूर्व राज गुप्‍ता और रेणु जुनेजा ने नई और संग्रह से चुनी हुई कविताओं का पाठ किया।
सुप्रसिद्ध कथाकार रत्नकुमार सांभरिया ने श्रीमती राज गुप्ता के काव्य संग्रह ‘प्रखर हुआ जब मौन’ पर चर्चा करते हुए कहा कि लगता है कवयित्री ने कुदरत के कहर से खूब संघर्ष किया है। उन्होंने राज गुप्‍ता के जीवन संघर्ष की चर्चा करते हुए कई कविताओं को उद्ध्रत करते हुए कहा कि दुःख, कठिनाईयां, खाइयों और हृास का हम अहसास कर सकते हैं पर उसका चेहरा हमें दिखाई नहीं देता। उनकी कविताएं बदलते मनुष्य को लेकर सवाल पर सवाल खड़े करती है।
जाने माने व्यंग्यकार एवं कवि फारूक आफरीदी ने कहा कि श्रीमती राज गुप्ता की कविताओं में ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में अपने वे जीवन अनुभवों की गहरी छाप दिखाई पड़ती है। श्रीमती गुप्ता की कविताओं में नारी चेतना के स्वर भी मुखर होकर उभरे हैं। इसी प्रकार रेणु जुनेजा के काव्य संग्रह ‘अन्तर्मन के वातायन’ की कविताएं समय और समाज सापेक्ष हैं। उनमें एक विशेष जिजीविषा के साथ जीवन से लड़ने के लिए संघर्ष के बीज साफ-साफ दिखाई पड़ते है। रेणु की कविताएं रिश्तों की भी सूक्ष्म पड़ताल करती है।
युवा कवि वियजसिंह नाहटा और कवयित्री सुश्री रश्मि भार्गव ने दोनों कवयित्रियों के संग्रहों पर अपनी टिप्पणियों में कहा कि आज के समय को वे बेहतर तरीके से रेखांकित करती हुई प्रतीत होती हैं। इन कविताओं में जीवन का गहरा मर्म छुपा हुआ है तथा सतत संघर्ष की अभिलाषा परिलक्षित होती है। रेणु जुनेजा की किताब पर उन्‍होंने कहा कि इन कविताओं में मानवमात्र के प्रति वात्‍सल्‍य, समाज की बेहतरी की आकांक्षा, अमानवीय के खिलाफ प्रतिरोध और जीवनानुभूतियों का सच्‍चा चित्रण है।
श्रीमती राज गुप्ता की काव्य कृति पर केप्टन के.एल. सिरोही ने तारादत्‍त निर्विरोध की टिप्पणी पढ़ कर सुनाई। उन्‍होंने राज गुप्‍ता के सामाजिक सेवा कार्यों की भी चर्चा की।
प्रारम्भ में प्रलेस जयपुर इकाई के सचिव ओमेन्द्र ने अतिथियों का स्वागत किया। अंत में इकाई अध्यक्ष गोविन्द माथुर ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन राज. प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रेमचन्द गांधी ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जयपुर के गणमान्य कवि कथाकार, लेखक, पत्रकार एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।

सोमवार, 22 जून 2009

हबीब तनवीर को श्रध्दांजलि

शुक्रवार ,१२जून को राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी में राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ एवं राजस्थान जन नाट्य संघ की ओर से रंगकर्मी हबीब तनवीर को स्मरण किया गया। वरिष्ठ रंगकर्मी रणवीर सिंह ने हबीब तनवीर के साथ व्यतीत की किये गए पलों का स्मरण करते हुए उन्हें आधुनिक थियेटर का महान व्यक्तिव बताया । नाट्य निर्देशेक सरताज नारायण माथुर एवं कवि नाटक लेखक नन्द किशोर आचार्य ने हबीब तनवीर के नाट्य कर्म को रेखांकित किया । गोविन्द माथुर, राजा राम भादू एवं किरण राठौड़ ने भी विचार व्यक्त किए । प्रलेस के महासचिव प्रेम चंद गाँधी ने सञ्चालन किया। अंत में दो मिनट का मौन रख कर, हबीब साहेब के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गयी.